*एक नास्तिक की भक्ति*

*अशोक दास एक मेडिकल स्टोर का मालिक था। सारी दवाइयों की उसे अच्छी जानकारी थी,*

 *दस साल का अनुभव होने के कारण उसे अच्छी तरह पता था कि कौन सी दवाई 💊कहाँ रखी है।*

 *वह इस व्यवसाय को बड़ी सावधानी और बहुत ही निष्ठा से करता था।*

*दिन भर उसकी दुकान में  भीड़ लगी रहती थी, वह ग्राहकों को वांछित दवाइयों💊 को सावधानी और समझदारी से देता था।*

*परन्तु उसे भगवान पर कोई भरोसा नहीं था । वह एक नास्तिक था,उसका मानना था की प्राणी मात्र की सेवा करना ही सबसे बड़ी पूजा है। और वह जरूरतमंद लोगों को दवा निशुल्क भी दे दिया करता था।*

*और समय मिलने पर वह मनोरंजन हेतु अपने दोस्तों के संग दुकान में कैरम खेलता था।*

*एक दिन अचानक बारिश होने लगी,बारिश की वजह से दुकान में भी कोई नहीं था। बस फिर क्या, दोस्तों को बुला लिया और सब दोस्त मिलकर कैरम खेलने लगे।*

*तभी एक छोटा लड़का उसके दूकान में दवाई लेने पर्चा लेकर आया। उसका पूरा शरीर भींगा था।*

*अशोक दास कैरम खेलने में इतना मशगूल था कि बारिश में आए हुए उस लड़के पर उसकी नजर नहीं पड़ी।*

*ठंड़ से ठिठुरते हुए उस बच्चे ने दवाई का पर्चा बढ़ाते हुए कहा- "साहब जी मुझे ये दवाइयाँ चाहिए, मेरी माँ बहुत बीमार है, उनको बचा लीजिए।*

 *बाहर और सब दुकानें बारिश की वजह से बंद है। आपके दुकान को देखकर मुझे विश्वास हो गया कि अब मेरी मां बच जाएगी।*

*उस लड़के की पुकार सुनकर कैरम खेलते-खेलते ही अशोक दास ने दवाई के उस पर्चे को हाथ में लिया और दवाई देने को उठा, कैरम के खेल में व्यवधान के कारण  अनमने से दवाई देने के लिए उठा ही था की बिजली चली गयी। अपने अनुभव से अंधेरे में ही दवाई की शीशी को झट से निकाल कर उसने लड़के को दे दिया।*

*दवा के पैसे दे कर लड़का👨 खुशी-खुशी दवाई की शीशी लेकर चला गया।*

*अंधेरा होने के कारण खेल बन्द हो गया और दोस्त भी चले गऐ।*

*अब वह दूकान को जल्दी बंद करने की सोच रहा था। तभी लाइट आ गई और वह यह देखकर दंग रह गया कि उसने दवाई समझकर उस लड़के को दिया था, वह चूहे मारने वाली जहरीली दवा की शीशी थी।*

 *जिसे उसके किसी ग्राहक ने थोड़ी ही देर पहले लौटाया था और कैरम  खेलने की धुन में उसने अन्य दवाइयों के बीच यह सोच कर रख दिया था कि खेल समाप्त करने के बाद फिर उसे अपनी जगह वापस रख देगा !!*

*उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी दस साल की विश्वसनीयता पर मानो जैसे ग्रहण लग गया। उस लड़के बारे में वह सोच कर तड़पने लगा।*

*यदि यह दवाई उसने अपनी बीमार माँ को पिला दी, तो वह अवश्य मर जाएगी।*

*एक पल वह अपने कैरम खेलने के शौक को कोसने लगा और दूकान में खेलने के अपने शौक   को छोड़ने का निश्चय कर लिया पर यह बात तो बाद के बाद देखी जाएगी। अब उस गलत दी दवा का क्या किया जाए ?*

*उस लड़के का पता ठिकाना भी तो वह नहीं जानता। कैसे उस बीमार माँ  को बचाया जाए?*

*सच कितना विश्वास था उस लड़के की आंखों में।* 

*अशोक दास को कुछ सूझ नहीं रहा था। घर जाने की उसकी इच्छा अब ठंडी पड़ गई। दुविधा और बेचैनी उसे घेरे हुए था। घबराहट में वह इधर-उधर देखने लगा।*

*पहली बार श्रद्धा से उसकी दृष्टि दीवार के उस कोने में पड़ी, जहाँ उसके पिता ने जिद्द करके श्री सद्गुरू कबीर साहेब जी  का छोटा सा चित्र दुकान के उदघाटन के वक्त लगा दिया था ,*
*पिता से हुई बहस में एक दिन उन्होंने अशोक दास से श्री सद्गुरू साहेब जी  को कम से कम एक शक्ति के रूप मानने और पूजने की मिन्नत की थी।*

*उन्होंने कहा था कि साहेब  की भक्ति में बड़ी शक्ति होती है, वह हर जगह व्याप्त है और श्री सद्गुरू साहेब जी  में हर बिगडे काम को ठीक करने की शक्ति है ।*
 *अशोक दास को यह सारी बात याद आने लगी। उसने कई बार अपने पिता को साहेब  की तस्वीर के सामने हाथ  जोड़कर, आंखें बंद करके कुछ बोलते हुऐ  देखा था।*

*उसने भी आज पहली बार दूकान के कोने में रखी उस धूल भरी श्री सद्गुरू साहेब जी  की तस्वीर को देखा और आंखें बंद कर दोनों हाथों को जोड़कर वहीं खड़ा हो गया।*

*थोड़ी देर बाद वह छोटा लड़का फिर दुकान में आया। अशोक दास बहुत अधीर हो उठा। क्या बच्चे ने माँ को दवा समझ के जहर पिला दिया ?*
 
*इसकी माँ मर तो नही गयी !!*
*अशोक दास का रोम रोम कांप उठा ।पसीना पोंछते हुए उसने शान्त हो कर धीरे से कहा- क्या बात है बेटा अब तुम्हें क्या चाहिए?*

*लड़के की आंखों से पानी छलकने लगा। उसने रुकते-रुकते कहा- बाबूजी... बाबूजी माँ को बचाने के लिए मैं दवाई की शीशी लिए भागे जा रहा था, घर के निकट पहुँच भी गया था, बारिश की वजह से ऑंगन में पानी भरा था और मैं फिसल गया।*

 *दवाई की शीशी गिर कर टूट गई। क्या आप मुझे दवाई की दूसरी शीशी दे सकते हैं बाबूजी?*

*अशोक दास  हक्का बक्का रह गया। क्या ये सचमुच श्री सद्गुरू कबीर साहेब जी  का चमत्कार है !*

*हाँ! हाँ ! क्यों नहीं? अशोक दास  ने चैन की साँस लेते हुए कहा। लो, यह दवाई!*

*पर मेरे पास पैसे नहीं है।"उस लड़के ने हिचकिचाते हुए बड़े भोलेपन से कहा।*

*कोई बात नहीं- तुम यह दवाई ले जाओ और अपनी माँ को बचाओ। जाओ जल्दी करो, और हाँ अब की बार ज़रा संभल के जाना।*

 *लड़का, अच्छा बाबूजी कहता हुआ खुशी से चल पड़ा।*

*अशोक दास की आंखों से अविरल आंसुओं की धार बह निकली। श्री सद्गुरू साहेब  को धन्यवाद देता हुआ अपने हाथों से उस धूल भरे तस्वीर को लेकर अपनी छाती से पोंछने लगा और अपने माथे से लगा लिया*

*जल्दी से दुकान बंद करके वह घर को रवाना हुआ। उसकी नास्तिकता की घोर अंधेरी रात भी अब बीत गई थी और अगले दिन की नई सुबह एक नए अशोक दास की प्रतीक्षा कर रही है। 

*🙏साहेब बंदगी साहेब 🙏*
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