🌹 *भगवान को भोग*🌹
*एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से प्रश्न किया : "क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ? यदि हाँ, तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं होती और यदि ना, तो भोग लगाने का फिर क्या लाभ ?"*
*गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया - वे पाठ पढ़ाते रहे ! उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया :* *पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥*
*पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने सभी शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें !*
*एक घंटे बाद गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं ! उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया ! फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया, तो शिष्य ने कहा कि चाहें, तो पुस्तक देख लें - श्लोक बिल्कुल शुद्ध है !” गुरु ने पुस्तक दिखाते हुए कहा - “ श्लोक तो पुस्तक में ही है , तो तुम्हें कैसे याद हो गया ?” शिष्य कुछ नहीं कह पाया !*
*गुरु ने कहा “पुस्तक में जो श्लोक है, वह स्थूल रूप में है ! तुमने जब श्लोक पढ़ा तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गया! उसी सूक्ष्म रूप में वह तुम्हारे मन में रहता है ! इतना ही नहीं, जब तुमने इसको पढ़कर कंठस्थ कर लिया, तब भी पुस्तक के स्थूल रूप के श्लोक में कोई कमी नहीं आई ! इसी प्रकार पूरे विश्व में व्याप्त परमात्मा हमारे द्वारा चढ़ाए गए प्रसाद को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं और इससे स्थूल रूप के वस्तु में कोई कमी नहीं होती ! उसी को हम प्रसाद के रूप में स्वीकार करते हैं !*
*शिष्य को उसके प्रश्न का उत्तर मिल चुका था !*
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