. माया मरी न मन मरा, मर-मर गया शरीर
सुना है तेरी दया दिन-रात बरसती ही रहती है। आखिर भगवान की दया बरसती है
तो फिर मिलती क्यों नहीं है???
यह एक बड़ा प्रश्न है। मैंने एक संत से यही सवाल पूछा था। जिंदगी के अनुभवों से भी काफी कुछ सीखा। मान लीजिए कि आसमान से पानी बरस रहा है। उस पानी को हम किसी बर्तन में जमा कर सकते है, यदि पात्र में ही छेद रहेगा तो पानी कहां से जमा होगा। उसी तरह यदि व्यक्ति पात्र नहीं होगा तो खुदाई रहमत को वह संभाल कर नहीं रख सकता है।
विद्या से विनय की प्राप्ति होती है, विनयशील होकर व्यक्ति में पात्रता आती है। पात्र बनने से व्यक्ति के पास धन आता है। धन से धर्म होता है और धर्म से सुख होता है। यानी, सीधे धन से सुख नहीं होता है। धन को हम सुख से जोड़ कर नहीं देख सकते हैं।
आइए, अब इस प्राचीन श्लोक का विश्लेषण करते हैं। जिस विद्या से विनय की प्राप्ति ना हो वह नाश का कारण बनती है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण लंकापति रावण है। रावण से बड़ा विद्वान कोई नहीं था। जब रावण की मृत्यु हो रही थी, उस समय भगवान राम ने लक्ष्मण को उनके पास भेजा था। कहा, संसार के सबसे बड़े ज्ञानी की मौत हो रही है। जाओ लक्ष्मण, कुछ ज्ञान लेकर आओ। लक्ष्मण चल दिए। उन्होंने रावण से तीन बार ज्ञान देने का अनुरोध किया। लेकिन, रावण ने कोई जवाब नहीं दिया।
लक्ष्मण लौट कर भगवान राम के पास आ गए। उन्होंने कहा, प्रभु। मैंने तो रावण ने काफी ज्ञान देने का अनुरोध किया लेकिन रावण ने कुछ नहीं कहा। भगवान राम ने पूछा, तुम कहां खड़े हुए थे। लक्ष्मण ने कहा, मैं रावण के सिर के पास खड़ा था। भगवान राम ने कहा कि यदि तुम्हें ज्ञान लेना है तो पहले झुकना सीखो। किसी से ज्ञान लेने के लिए उसके सिर के पास नहीं बल्कि पैरों के पास खड़ा होना चाहिए। इस समय तुम युद्ध में जीते हुए विजेता नहीं, बल्कि एक शिष्य हो। रावण जैसे विद्वान धरती पर कम ही हैं।
इस बार लक्ष्मण पुन: रावण के पास पहुंचे। उनके पैरों के पास खड़े हुए। इस बार विनम्र होकर ज्ञान देने का लक्ष्मण ने अनुरोध किया। इस बार रावण प्रसन्न हुआ और लक्ष्मण को तीन बातें बताईं। पहली बात रावण ने कहा कि शुभ कार्य को शीघ्र कर लेना चाहिए। अशुभ कार्य को जितने समय के लिए हो सके, टालने का प्रयास करना चाहिए। शुभ कार्य जीवन में संपन्नता लाते हैं और अशुभ कार्य विनाश का कारण बनते हैं। मैं प्रभु श्रीराम को पहले नहीं पहचान सका और उनकी शरण में आने में देर कर दी। यह मेरे विनाश का एक कारण बना। मैंने अशुभ कार्य अर्थात भगवान राम से शत्रुता और उनसे युद्ध को प्राथमिकता दी। इस कार्य को शीघ्र किया। और शुभ कार्य, यानी उनसे संधि नहीं की। इसी कारण मेरी यह गति हुई है। दूसरी बात यह है कि शत्रु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। मैंने मानवों और बंदर-भालुओं को तुच्छ समझा। मैंने यमराम तक पर आक्रमण किया। लेकिन, यही मेरी भूल थी। मैंने सोचा कि वानर-भाल की सेना मेरा क्या बिगाड़ सकती है। उसी सेना ने मेरे गर्व को चूर-चूर कर दिया। शत्रु को छोटा समझना एक बड़ी भूल है। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई तुच्छ नहीं होता। मैंने ब्रह्मदेव से वरदान मांगते समय कहा था कि मुझे मनुष्य और वानरों को छोड़ कर कोई ना मार सके। मैं इन्हें तुच्छ समझता था। इसी ने मेरे अहंकार को मिट्टी में मिला दिया।
यहां हम यह देख सकते हैं कि विद्या से रावण ने विनय की प्राप्ति नहीं की। इसी कारण उसका विनाश हुआ। भगवान राम ने भी लक्ष्मण को विद्या लेने के पूर्व विनयशील होने की आवश्यकता बताई। यानी कि विद्या से पहले विनय की प्राप्ति होती है। विद्या प्राप्त होने के बाद भी विनयशील ना होने के कारण संसार का सबसे शक्तिशाली योद्धा रावण, जिसकी नाभि में अमृत था, का भी विनाश हो गया। इसी कारण जीवन में यह आवश्यक है कि विद्या प्राप्त करने के साथ ही विनयशील हो जाएं। जब पेड़ों में फल लगते हैं तो वे झुक जाते हैं। जो नहीं झुकता है, वह टूट जाता है। जब आंधी चलती है तो वे विशाल वृक्ष जो झुकना नहीं जानते हैं, टूट जाते हैं। वहीं झुकने वाली कोमल घास सही-सलामत रहती है।
विनयशील होकर व्यक्ति पात्र बनता है। जब तक व्यक्ति में विनय नहीं आता है, तब तक वह पात्र नहीं बनता है। इस संबंध में भी एक कथा है।
एक बार कुबेर ने भगवान शिव को भोजन के लिए आमंत्रित किया। भगवान शिव समझ गए कि कुबेर के मन में अहंकार समा चुका है।
उन्होंने गणेश जी को भेज दिया। गणेश जी पलक झपकते ही सारा भोजन चट कर गए।
धनपति कुबेर ने काफी इंतजाम किया लेकिन वे गणेश जी की भूख शांत नहीं कर सके। तब वे दौड़ कर मां पार्वती के पास पहुंचे। मां पार्वती ने अपने हाथ से दो निवाले खिलाए। इसके बाद गणेश जी की भूख शांत हुई।
तो विनयशील होने से व्यक्ति में पात्रता आती है। पात्रता के बाद व्यक्ति धन को रखने के लायक होता है।
यदि पात्रता नहीं रहेगी तो व्यर्थ के कामों या दुव्र्यसनों में व्यक्ति अपना सारा धन उड़ा देगा।
कहा भी गया है,
पूत कपूत तो क्यों धन संचै,
पूत-सपूत तो क्यों धन संचै।
यानी किसी भी हालत में व्यक्ति को धन संचय की जरूरत नहीं रहती। सारा कुछ चरित्र पर ही निर्भर रहता है।
मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने ढेर सारा धन संचित कर लिया। खुद जीवन भर कोई सुख नहीं भोगा, सिर्फ यही सोचा कि आने वाली पीढिय़ां सुख से जीएंगी। यदि पुत्र ही कुपुत्र निकल गया तो जीवन भर पाई-पाई कर जोड़ी गई संपत्ति वह क्षण में उड़ा देगा। फिर खुद जीवन भर कष्ट भोगता रहेगा।
अत: यदि पुत्र कुपुत्र निकल जाता है तो धन संचय की कोई आवश्यकता नहीं रहती है। यानी, पूत कपूत तो क्यों धन संचै। ऐसे धन संचय का क्या लाभ। फिर कहा गया है कि पूत-सपूत तो क्यों धन संचै। यदि पुत्र सुपुत्र निकल गया तो वह खुद ही संपत्ति अर्जित कर लेगा। आपको उसके भविष्य के लिए अपने-आप को कष्ट में रखने की जरूरत नहीं। जीवन भर भूखे रहने का लाभ नहीं।
पुत्र को अच्छी शिक्षा दीजिए, संस्कार दीजिए, वह खुद ही धन अर्जित कर लेगा। यानी, पूत-सपूत तो क्यों धन संचै। यानी पात्रता आने के बाद ही धन आने से जीवन में लाभ मिलता है। यदि पात्रता नहीं है तो धन का कोई लाभ नहीं। वह यूं ही समाप्त हो जाएगा।
फिर, धन से धर्म होता है और धर्म से सुख होता है। यानी, सीधे धन से सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है। कई लोगों को लगता है कि धन आ गया तो सुख की प्राप्ति हो जाएगी। लेकिन, ऐसा नहीं है। आप खुद जरा सोच कर देखें।
मान लें कि आपके पास काफी सारा धन है। आज जी भर कर दुनिया के सारे काम कर लेंगे। लेकिन, कब तक। एक दिन इन सबसे मन ऊबेगा। एक दिन आप बोर हो जाएंगे। और कब तक धन का सहारा। एक ना एक दिन सब छूटना ही है। तब अपने सत्कर्म ही सहायक सिद्ध होंगे। यानी धन के बाद मनुष्य को धर्म का सहारा लेना चाहिए। धर्म से ही सच्चा सुख होता है।
धर्म और कीर्ति ही संसार में रहती है। यही व्यक्ति को मौत के बाद भी सुख देते हैं। लोगों को यह संबल रहता है कि मौत के बाद भी उनका नाम लिया जाएगा। यही सच्चा सुख है।
इस संबंध में एक बोध कथा भी है।
एक सेठ के पास काफी दौलत थी। वे दान-पुण्य में कुछ भी खर्च नहीं करते थे। हमेशा अपने पैसे को बचाने के नए-नए तरीके सोचते रहते। किस प्रकार धन बढ़े, इसी चिंता में वे चिड़चिड़े हो गए थे। एक बार उनके द्वार पर एक साधु आए। उन्होंने साधु को कुछ भी दान नहीं दिया। साधु ने ध्यान लगा कर देखा तो सारी स्थिति समझ गए। उन्होंने सेठ जी से कहा कि वे उनसे कुछ लेने नहीं आए हैं। उनके पास अपना एक सामान रखने आए हैं। उन्होंने सेठ को एक सूई दी। कहा, जब सेठ की मृत्यु हो जाएगी और वे स्वर्ग चले जाएंगे तो वहां उनसे वे सूई ले लेंगे। सेठ ने कहा, यह कैसे हो सकता है। आपने मुझे धरती पर सूई दी है और चाह रहे हैं कि मैं वह सूई आपको स्वर्ग में लौटाऊं। भला मरने के बाद मैं यहां से सूई लेकर स्वर्ग कैसे जा सकता हूं। साधु ने कहा कि यदि आप एक छोटी सी सूई लेकर स्वर्ग नहीं जा सकते हैं तो फिर इस धन-संपत्ति के प्रति इतना मोह क्यों। यह धन-संपत्ति भी तो आप स्वर्ग लेकर नहीं जा सकते हैं। बात सेठ की समझ में आ गई। वह साधु के चरणों में गिर पड़ा। उस दिन से सेठ ने अपनी धन-संपत्ति का द्वार गरीबों और जरूरतमंदों के लिए खोल दिया।
संसार की रीत भी इसी प्रकार उल्टी ही चलती है। हम जो समझ रहे हैं, वस्तुत: वैसा होता नहीं है। जो होता है, उसे हम समझ नहीं पाते हैं। कुछ-कुछ कबीर की उलटबासी की तरह। एक बार एक श्रद्धालु ने कबीरदास को मलमल का एक कुरता पहनने को दिया। कबीरदास ने उल्टा कुरता पहन लिया। भक्त ने उनसे कहा कि वे उल्टा कुरता पहने हुए हैं। कबीरदास ने कहा, दुनिया ऐसा समझती है लेकिन मैं ऐसा नहीं समझता। मलमल का हिस्सा दुनिया को दिखाने के लिए लोग बाहर रखते हैं और कपड़े का रूखा भाग अंदर। ऐसे में दुनिया तो सुखी होती है लेकिन शरीर को मलमल का लाभ नहीं मिल पाता। मैंने तो मलमल को शरीर से लगा कर रखा है। रूखा भाग बाहर है। अब बताओ, मैं सही हूं या तुम सही हो। कुल मिला कर समझ का ही फेर है। आंखों को जो दिखाई पड़ता है वह सही है या जो दिखाई नहीं पड़ता है वह सही है। सुख तो आपके अंदर है। बुद्ध कहते हैं कि सुख की तलाश में बाहर मत भटको, अपने अंदर जाओ। बाहर तुम्हें कोई दु:खों से मुक्ति नहीं दिला सकता है। अपने अंदर ही समा जाओ। ध्यान और तप का सहारा लो। तब तुम्हें सच्चा सुख मिलेगा।
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