मोक्ष
*शास्त्रो मे चार पुरूषार्थ बताए गये है*।
*धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष , धर्म और मोक्ष नदी के दो किनारे है । अर्थ और काम इसमे बहता पानी है । अर्थ कमाओं धन के लिए काम करो मोक्ष के लिए ।*
एक बार सभी आत्माओ ने हड़ताल कर दिया । सब परेशान थे उन्हें बार बार इस जमीन मे भेजा जाता है। जहां दुख के सिवाय कुछ नहीं है। पेट भरने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता । ठंड, बरसात ,गर्मी सहना पड़ता है। नाना प्रकार के कष्ट है । संत लोग इसका समर्थन करते है। और मोक्ष के चक्कर मे लगे रहते है।
परमात्मा ने उनकी बात गौर से सुना फिर समझाया कि दूर के ढोल सुहावना होते है भाईओ स्वर्ग मे रहना आसान काम नहीं है। आत्माओ ने सोचा परमात्मा हमे बरगला रहा है। हम बिना देखे नहीं मान सकते। आखिर दो हफ्ते के लिए प्रायोगिक तौर पर स्वर्ग मे रहने की बात पर समझौता हो गया । तय यह हुआ कि दो हफ्ते स्वर्ग मे रहने के बाद जिसकी इच्छा होगी वह स्वर्ग मे रहेगा जो भूलोक मे आना चाहेगा उसको वापस भेज दिया जायेगा। परमात्मा की लीला भी अजीब था । बाद मे पता चलेगा क्या था।
अब सभी आत्मा स्वर्ग पहुंच गये, स्वर्ग का मनोरम दृश्य
फिर भी सब शांत ,बस निश्चल निर्वीकार भाव से इधर उधर घूम रहे थे। जब दिन के दो बज गये सब आत्मा सोच रहे थे कि यहां तो छत्तीस प्रकार का उम्दा भोजन मिलेगा सोमरस पीने को मिलेगा ! तीन बजते बजते भगवान से पूछना शुरू किये। प्रभु भोजन कब मिलेगा । परमात्मा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई बोले आप लोगो को भूख लगी है ? सब आत्माओ ने महसूस किया वाकई मे ऊन्हे भूख नही लगी है। बोले हां प्रभु भूख तो नहीं लगी है। परमात्मा की मुस्कान थोड़ी टेढ़ी हो गई और बोले फिर भोजन की क्या आवश्यकता ये स्वर्ग है भाई यहां भूख प्यास नहीं लगता अतः यहां भोजन पानी की जरूरत नहीं है । आत्माओ ने अपने आत्मा को समझाया चलो ये त्याग कर लेते है।
शाम को सोच रहे थे ,अप्सराओं का नाच देखेंगे ।
रात के आठ नौ बज गये नाच शुरू नहीं हुआ । तब सब आत्माओं मिल कर परमात्मा से पूछा प्रभु हमने तो सुना था स्वर्ग मे अप्सराओं का नाच होता है। परमात्मा के चेहरे पर वही टेढ़ी मुस्कान आई बोले पृथ्वी मे नाच गाना क्यों देखते थे । आत्माओ ने बोला प्रभु रोजमर्रा के थकावट को दूर करते थे। परमात्मा बोले यहां कोई थकावट,कोई दुख या तनाव अनुभव हो रहा है । सब आत्माओं ने महसूस किया वाकई मे ऐसा कुछ महसूस नहीं मन निर्मल और निर्वीकार है । परमात्मा से बोले प्रभु ऐसा तो कुछ महसूस नहीं हो रहा। परमात्मा की मुस्कान फिर टेढ़ी हो गई फिर बोले मनोरंजन की जरूरत क्या । और आगे ये भी बता देता हुं, कि आपको नींद नहीं आयेगी बिस्तर की मांग मत करना क्योकि जरूरत नहीं है। सब आत्माओं की बोलती बंद। ३६ घंटे मे ही सभी आत्माओ मे खुसुरपुसूर चालू हो गया । भाई ये जीना भी कोई जीना, न दुख न प्यास, न सोने को बिस्तर ,न मनोरंजन का साधन इससे अच्छा तो हमारी पृथ्वी है , जहां हम अपने मर्जी के मालिक थे । सबको पनीर पालक ,स्प्राईट याद आ गये। सबेरे सबेरे गरमागरम चाय बिस्किट के साथ, चौपाटी की शाम।
४८ घंटे बीतते बीतते सब आत्माओं ने तय कर लिया कि हम पृथ्वी मे ही रहेंगे वही हमारा स्वर्ग है । परमात्मा से विनय करने लगे प्रभु हमे वापस पृथ्वी मे भेज दीजिए ।
वहीं हमारा स्वर्ग है। परमात्मा ने राहत की सांस ली तथास्तु बोले सबको पृथ्वी भेज दिया ।
पृथ्वी मे सभी आत्मायें आनंद से रहने लगे ।
कहानी खतम होती है मगर दो प्रश्न रह जाते है
परमात्मा की कौन सी लीला अजीब थी ?
दूसरा परमात्मा ने राहत की सांस क्यों लिया ?
इस पृथ्वी मे ही अंदाज लगाइये और मस्त रहिये।
*मोक्ष कोई भूमि नहीं है, एक भूमिका है।*
*इसका तालुक मन से है, एक मन से जुडी स्थिति है।*
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