. 🙏सद्कर्मों का फल🙏
जब चौथे पातशाह श्री गुरु राम दास जी महाराज के समय अमृतसर श्री हरिमंदिर साहब जी की सेवा चल रही थी।
उस वक्त बहुत संगत सेवा कर रही थी, उस सेवा में उस समय का राजा भी सेवा के लिए आता था। गुरु साहिब उस राजा को देख कर मुस्कुराते थे। ऐसा तीन-चार दिन होता रहा। एक दिन राजा ने गुरु साहिब से पूछा :
हे सच्चे पातशाह ! आप हर रोज मुझे देख कर मुस्कुराते क्यों है........ ?
तब गुरु साहिब ने बङे प्यार से राजा की तरफ देखा और उन्हें एक छोटी सी साखी सुनाई।
हे राजन ! बहुत समय पहले की बात है कि एक दिन संगत इसी तरह सेवा कर रही थी, पर उस सेवा में कुछ दिहाडीदार मजदूर भी थे, जो संगत , सेवा भावना से सेवा कर रही थी तो शाम को गुरु साहिब, उन सारी संगत को दर्शन देते थे। एक दिन उस दिहाङीदार मजदूर ने सोचा कि क्यों ना मैं भी बिना दिहाड़ी के आज सेवा करूं। उसने यह बात अपने परिवार से की । परिवार ने कहा कोई बात नहीं आप सेवा में जाओ, एक दिन हम दिहाड़ी नहीं लेंगे। भूखे रह लेंगे, लेकिन एक दिन हम सेवा को जरूर देंगे।
यह साखी सुना कर गुरु साहिब चुप कर गए, राजा उलझन में पड़ गया, और हाथ जोड़कर गुरु साहिब से प्रार्थना की :
हे सच्चे पातशाह ! लेकिन आप मुझे देख कर मुस्कुराते हैं, इसका क्या राज है.....?
गुरु साहिब ने फिर मुस्कुराते हुए, उसको जवाब दिया :
हे राजन ! पिछले जन्म में वो मजदूर तुम थे।
सेवा का फल, एक ना एक दिन जरूर मिलता है। सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। चाहे ज्यादा की गई हो चाहे थोङी।
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