जहरीला पानी
मैंने सुना है कि एक साधु अपने एक शिष्य के साथ यात्रा को गया। हजारों मील से पैदल चल कर वे आ रहे थे। मरुस्थल में मार्ग खो गया। बड़ी प्यास लगी।
किसी तरह खोज कर एक छोटा सा झरना मिल गया। बड़े प्रसन्न हुए। न केवल झरना मिला, बल्कि झरने के पास ही पड़ा एक पात्र भी मिल गया, क्योंकि उनके पास पात्र भी न था। उनके आनंद का कोई ठिकाना न रहा। उन्होंने उस पात्र में झरने का पानी भरा, लेकिन जब पीने गए तो वह इतना तिक्त और कड़वा था, जहरीला था, कि घबड़ा गए कि यह तो मरने की बात हो जाएगी। यह तो झरना जहर का है।
उस झरने को तो छोड़ा, दूसरे झरने की तलाश में निकले, लेकिन पात्र को साथ ले लिया। दूसरे झरने पर जाकर पानी पीया, वह भी जहरीला था। अब तो बहुत घबरा गए कि मौत निश्चित है। जल सामने है, पी नहीं सकते। कण्ठ सूख रहा है।
तीसरे झरने की तलाश में गए, वह भी मिल गया; लेकिन पानी पीया तो वह भी कड़वा था। पर तीसरे झरने पर एक और आदमी, एक साधु बैठा था। उससे उन्होंने कहा कि हम समझते नहीं कि यह मामला क्या है, सब झरने कड़वे हैं! उस साधु ने गौर से देखा उन्हें और कहा कि झरने तो कड़वे नहीं हैं, जरूर तुम्हारे पात्र में कुछ खराबी होगी। क्योंकि मैं तो इन्हीं झरनों पर जी रहा हूं। तुम झरने से सीधा पानी पीओ, पात्र में मत भरो।
सीधा पानी पीया तो ऐसा मीठा पानी कभी पीया ही न था। वह पात्र गंदा था। वह पात्र जहरीला था।
तो जिस आकांक्षा के पात्र में तुमने सारे संसार के जहर भोगे हैं, उसी आकांक्षा के पात्र में भगवान को भी डाल लोगे, वह भी कड़वा हो जाएगा। इसीलिए तो तुम्हारी भगवान की आकांक्षा भी दुख ही देती है, सुख कहां देती है!
अक्सर मैं देखता हूं कि धार्मिक आदमी जिसे तुम कहते हो, वह उससे भी ज्यादा दुखी होता है जिसको तुम सांसारिक कहते हो। सांसारिक को धन चाहिए, पद चाहिए–ठीक है; यह धार्मिक को धन भी चाहिए, पद भी चाहिए, भगवान भी चाहिए। इसकी बीमारी और भी भयंकर है। सांसारिक का गणित कम से कम सीधा-साफ-सुथरा है: पद चाहिए, धन चाहिए, यश चाहिए; ठीक है; खाओ-पीओ, मौज करो। तुम उसे थोड़ा कभी-कभी मुस्कुराते भी देख लोगे, हंसते भी देख लोगे।
धार्मिक आदमी की हालत तो बहुत ही खस्ता है। उसके हाल तो बड़े बुरे हैं। उसको धन भी चाहिए, पद भी चाहिए, यश भी चाहिए, भगवान भी चाहिए, ध्यान भी चाहिए, शांति भी चाहिए। उसकी हालत ऐसी है जैसे एक ही बैलगाड़ी में दोनों तरफ बैल जुते हों। अस्थिपंजर बैलगाड़ी के डगमगा जाएंगे, दोनों तरफ बैल खींच रहे हैं। यात्रा तो हो ही नहीं सकती।
उस पात्र को ही गिरा देना पड़ेगा। जिससे संसार के जल पीए, जहर पीए, जिससे केवल दुख जाने, उस पात्र को ही गिरा देना होगा। उस पात्र में भगवान की आकांक्षा को मत रखना। अगर पात्र न हो तो हाथों से अंजुलि भर कर ही भगवान का जल पी लेना, लेकिन उस गंदे पात्र में उसको मत गिरने देना।
और एक दिन तुम पाओगे कि आकांक्षा मात्र ही गंदा पात्र है। आकांक्षा की किसी चीज की, कि वह गंदी हो गई। मांगा, कि विषाक्त हुए। बिन मांगे जो मिल जाए, बिन चाहे जो मिल जाए, वही भगवान है। और मिल जाता है बिन मांगे, बिन चाहे।
लेकिन तुम पाते हो कि यह छोटी सी जो आकांक्षा है भगवान को पाने की, यह एक पर्दे की तरह है। भगवान आमने-सामने है अब, लेकिन एक झीना सा परदा है। हाथ तुम बढ़ाते हो, परदे से ही टकराता है। आंख परदे को ही देखती है। उसके पीछे छिपी हुई झलक दिखाई पड़ती है।
असली सवाल न तो मांगने का है, न चाहने का है; असली सवाल अपने को देने का है। अपने को देने को जो राजी है, उसे मिल जाता है।
सीधा भगवान प्रकट नहीं होता।
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