दाने दाने पर लिखा होता है, खाने वाले का नाम
एक समय की बात है कि श्री सत्य कबीर साहेब जी और उनके दो शिष्य रामदास और श्यामदास किसी गांव की ओर पैदल पैदल जा रहे थे| चलते चलते रास्ते में एक मकई (मक्का) का खेत आया| रामदास स्वभाव से बहुत कम बोलता था मगर जो श्यामदास था वह बात की नींव उधेड़ डालता था, सवाल पूछ पूछ कर कबीर जी की नाक में दम कर देता था,बड़ा ही जिज्ञासु प्रवृत्ति का था उसने मकई का खेत देखकर कबीर साहेब से सवाल किया, कि साहेब जी इस मकई के खेत में जितने दाने हैं, क्या वे सब पहले से निर्धारित कर दिए गए हैं, कि कौन इसका हकदार है? और यह किस-किस के मुंह में जाएंगे? इस पर सतगुरु कबीर साहेब ने कहा, बिल्कुल श्यामदास जी इस संसार में कहीं भी, कोई भी खाने योग्य कोई वनस्पति या जो भी भोज्य पदार्थ है, उस पर मुहर पहले ही लग गई है और जिसके नाम की मुहर लगी होगी, वही उस खाद्य सामग्री को खा सकेगा अन्य कोई नहीं |
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सतगुरु देव जी की इस बात ने श्यामदास के मन में कई सवाल खड़े कर दिए,उसने सतगुरु की बातो को झुठलाने के उद्देश्य से मकई के खेत से एक मक्का तोड़ लिया और उसका एक दाना निकालकर हथेली पर रख लिया और कबीर जी को दाना दिखाते हुए पूछने लगा कि हे,कृपानिधान कृपा करके मुझे बताएं इस दाने पर किसका नाम लिखा है? सद्गुरु कबीर ने इस पर जवाब दिया कि इस दाने पर एक मुर्गी का नाम लिखा है, बस फिर क्या था,कबीर का इतना कहना था कि श्यामदास जी ने उनके सामने बड़ी चालाकी दिखाते हुए मकई का वह दाना अपने मुंह में झट से फेंक लिया और गुरुजी से कहने लगा कि देखिये गुरुदेव ,आपके कुदरत का यह नियम तो बड़ी आसानी से टूट गया| लेकिन ये क्या, श्यामदास जी ने जैसे ही वह दाना निगलने का प्रयास किया,त्यों ही वह दाना श्यामदास जी की श्वास नली में फंस गया,उसको साँस लेने में दिक्कत होने लगी,उनकी हालत तीर लगे कबूतर जैसी हो गई श्यामदास जी ने गिडगिडाते हुए सतगुरु देव जी से कहा कि साहेब जी कुछ कीजिए, नहीं तो मैं मर जाऊंगा |तब कबीर साहब जी ने मंद मंद एक रहस्यमयी मुस्कान मुस्काते हुए कहा श्यामदास जी मैं क्या करूं ,मै कोई वैद्य या हाकिम तो हूँ नहीं, जो इस मकई के दाने को निकाल फेंकू| चलो पास के गांव में चलते हैं ,वहां किसी वैद्य को दिखाते हैं |वे तीनों लोग पास के गांव में गए, सौभाग्य से वैद्य जी घर पर ही मिल गए ,उनको सारी घटना से अवगत कराया गया तब उन्होंने उस मक्के के दाने को बाहर निकालने के लिए श्यामदास जी की नाक में नसवार डाल दी |नसवार बहुत तेज थी |नसवार सूंघते ही श्यामदास जी को छींक आनीं शुरू हो गई ,श्यामदास जी के जोर की छींकने की वजह से मकई का वो दाना गले से निकाल कर बाहर गिर गया |
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जिसे वहीं पास में चारा चर रही मुर्गी झट से निगल ली| सतगुरु कबीर
साहेब ने श्यामदास जी की ओर मुस्कुराते हुए देखा ,उनके मुस्कुराने का आशय समझ कर तुरंत श्यामदास जी ने कबीर साहेब से क्षमा
मांगी
और
कहा
कि
मुझे
माफ
कर
दीजिए
मैंने
आपकी
बात
पर
शक
किया|
सीख:- हमें गुरुओं के
वाणी वचनों पर कभी भी संशय नहीं करनी चाहिए,क्योकि उनका ज्ञान परीक्षित होता है|
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