. श्राप
एक दिन गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के दरबार में एक मदारी अपने रीछ के साथ प्रस्तुत हुआ।
मदारी के द्वारा सिखाए गए करतब रीछ ने संगत के सामने प्रस्तुत करने शुरू किए। कुछ खेल इतने हास्य से भरपूर थे, कि संगत की हसी रोके से ना रुक रही थी। करतब देख कर गुरु जी मुस्कुरा रहे थे,,एक सिख के ठहाकों से सारा दरबार गुंजायमान था। वो सिख था, गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज पर चवर झुलाने की सेवा करने वाला भाई कीरतिया...
भाई कीरतिया आप इन करतबों को देख,बड़े आनंदित हो गुरु साहब जी ने कहा। महाराज इस रीछ के करतब हैं,ही इतने हास्य पूर्ण सारी संगत ठहाके लगा रही है। मुस्कुरा तो आप भी रहें हैं, दातार,, भाई कीरतिया ने कहा।
हम तो कुदरत के करतब देख कर मुस्कुरा रहे हैं,भाई कीरतिया। कुदरत के करतब? कैसे महाराज
भाई कीरतिया, क्या आप जानते हो इस रीछ के रूप में ये जीवात्मा कौन है? नही दाता, ये बात मुझ जैसे साधारण जीव के बस में कहाँ? भाई कीरतिया,,रीछ के रूप में संगत का मनोरंजन करने वाला और कोई नही,,आप का पिता भाई शोभाराम है। भाई कीरतिया जी को जैसे एक आघात सा लगा। सर से लेकर पाँव तक सारा शरीर कांप गया। कुछ संभला तो हाथ में पकड़े चंवर को गुरुपिता के चरनों में रख दिया और बोले- सारा संसार जानता है, मेरे पिता भाई शोभाराम ने गुरु दरबार की ताउम्र सेवा की,, उन्होंने एक दिन भी गुरुसेवा के बिना व्यतीत नही किया। अगर उन जैसे सेवक की गति ऐसी है, तो गुरु जी,, सेवा करने का कोई लाभ नही। भाई कीरतिया,,आपके पिता भाई शोभाराम ने गुरुघर में सेवा तो खूब की लेकिन सेवा के साथ स्वयं की हस्ती को नही मिटाया। अपनी समझ को गुरु विचार से उच्च समझा। एक दिन हमारा एक सिख(शिष्य) अपनी फसल बैलगाड़ी पर लाद कर मण्डी में बेचने जा रहा था। राह में गुरुद्वारा देख मन में गुरुदर्शन करके कार्य पर जाने की प्रेरणा हुई। बैलगाड़ी को चलता छोड़,, वो सिख गुरुघर में अंदर आ गया। गुरबानी का पाठ चल रहा था। पाठ सम्पूर्ण हुआ, भाई शोभाराम ने प्रसाद बाँटना शुरू किया,,भाई शोभाराम जी, मुझे प्रसाद जरा जल्दी दे दीजिये, मेरी बैलगाडी़ चलते चलते कहीं दूर ना निकल जाएं। सिख ने विनती की..मेरे सिख के मैले कपड़ो से अपने सफेद कपड़े बचाते हुए, तेरे पिता भाई शोभाराम ने कहा अच्छा, अच्छा, थोड़ा परे हो कर बैठ, बारी आने पर देता हूँ। बैलगाड़ी की चिंता, सिख को अधीर कर रही थी। सिख ने दो तीन बार फिर बिनती की तो तेरे पिता भाई शोभाराम ने प्रसाद तो क्या देना था मुख से दुर्वचन कह दिए। कहा- अपनी जगह पर बैठ, समझ नही आती क्या। *क्यों रीछ के जैसे उछल उछल कर आगे आ रहा है। तेरे पिता के ये कहे अपशब्द मेरे सिख के साथ साथ, मेरा भी हृदय वेधन कर गए। सिख की नजर जमीन पर गिरे प्रसाद के एक कण पर पड़ी, उसी कण को गुरुकृपा मान कर अपने मुख में डाल कर सिख तो अपने गन्तव्य को चला गया लेकिन व्यथित हृदय से ये कह गयाकि सेवादार होने का मतलब जो सब जीवों को गुरु नानक जान कर सेवा करे। गुरू नानक जान कर आदर दे, जो सेवा करते समय सोचे कि वह वचन गुरु नानक जी को कह रहा है। प्रभु से किसी की भावना कहाँ छिपी है। हर कोई अपने कर्म का बीजा खायेगा,, रीछ मैं हूँ या आप,, गुरु पातशाह जाने*
सिख तो चला गया,,लेकिन तेरे पिता की सर्व चर्चित सेवा को गुरु नानक साहब ने स्वीकार नही किया, उसी कर्म की परिणिति तेरा पिता भाई सोभाराम आज रीछ बन कर संसार में लोगो का मनोरंजन करता फिरता है। इस का उछलना,, कूदना,, लिपटना, आंसू, सब के लिए मनोरंजन है।
गुरु पिता, मेंरे पिता को इस शरीर से मुक्त कर के अपने चरणों में निवास दीजिये। *हम बारिक मुग्ध इयान,, पिता समझावेंगे मोहे दूजी नाही ठौर, जिस पे हम जावेंगे।* हे करुणा निधान, कृपा करें, मेरे पिता की आत्मा को इस रीछ के शरीर से मुक्त करें,, गुरु जी ने अपने हाथों से रीछ बने भाई सोभाराम को प्रसाद दिया, भाई शोभाराम ने रीछ का शरीर त्याग, गुरु चरणों में स्थान पाया। गुरु जी से क्षमा मांग, चवर को उठाकर भाई किरतिया फिर से चवर की सेवा करने लगे।
*इससे हमें यह शिक्षा मिलती है, कि हमें अपनी बोलवानी सभी के प्रति ठीक रखनी चाहिए। चाहे वो कोई भी हो! बूढ़ा हो, जवान हो, या फिर बच्चा हो। अगर हम अपनी बोल बानी और अपना व्यवहार दूसरों के प्रति अच्छा रखते हैं। तो उस परमात्मा को उतनी ही खुशी मिलेगी। अगर हम किसी से दुर्व्यवहार करते हैं, तो वह गुरु का निरादर होगा। इसलिए सभी से अच्छे बोल बोलिए, अच्छी वाणी बोलिए, अच्छा व्यवहार कीजिए। तभी परमात्मा हमारे ऊपर खुश होंगे। अगर हम किसी का निरादर करते हैं, तो वह भगवान का निरादर होगा। तो गुरु कतई नहीं चाहेगे कि, कोई भी उन के किसी भी शिष्य का निरादर करे।
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